1060>|| जीवनकी एक सच ||

 1060>|| जीवनकी एक सच ||

          <--------आद्यनाथ----->

जीवन पबित्र होते हैं तब, 

जब मन पबित्र होते हैं तब।

और मन पबित्र होनेसे,

आत्मा भी पबित्र होते हैं।

आत्मा पबित्र होनेसे 

सारे दुनिया आपना हो जाते हैं।

सारे दुनिया अपना होनेसे 

रोग बलाई भी दूर होते हैं।

इसी तरा जीवन ही संजीवन बनजाते हैं,

जीवन उद्दार होजाते हैं।

जीवात्मा परमात्मासे भेट होंते हैं।

समाज तथा देश  की कल्याण होते हैं।


अध्यात्म में मनुष्य भगवान बन जाता है,

लेकिन हमेशा के लिए जीवित नहीं रहता.

 अर्थात मनुष्य जीवन अमर नेही होते हैं।

 उनका शरीर नष्ट हो जाते हैं लेकिन उनकी स्मृति अमर हो जाते हैं ।

   <-----आधनाथ राय चौधुरी------>

আধ্যাত্মিকতায় মানুষ দেবতা হন,

কিন্তু চিরজীবী হয় না।

শরীর ধ্বংস হইলেও তাহার স্মৃতি অবিনাশী।

দুর্লভ রত্ন যখন সুদূর্লভ হয়, তখন নিভৃতে পূজা লইবার জন্য তাহার স্মৃতি আমাদের বুক জুড়িয়া বসে।


এমন দুর্লভ মানুষজন্ম পেয়েও না পেলে তাঁরে 

জীবন আর জন্মটাই বৃথা যাবে।

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